कुपोषित व्यवस्था और मुरझाता मार्गदर्शक
- Abhshek Patni
उम्मीद की किरण
कारोबारी दुनिया का दायरा उम्मीद से कहीं ज़्यादा बड़ा और सक्रिय है। हर गुज़रते दिन से साथ विस्तार और व्यवसायीकरण ने तमाम मानदंड को ध्वस्त कर दिया है। व्यापार यानी मुनाफा, मुनाफा वो भी असीमित। आदमी के अंदर की लालच को व्यवसायीकरण ने मूर्त रूप दे दिया है। शिक्षा जैसा अतिसंवेदनशील क्षेत्र भी इसके पराकाष्ठा को जीने को बाध्य है। शिक्षा का निजीकरण और व्यवसायीकरण, मुनाफे का तड़का, मतलब बेजोड़ ज़ायका। ऐसे में एक ख़बर आती है, आई आई टी मुम्बई को एक पूर्ववर्ती छात्र ने अनुसंधान के लिए कई अरब रूपए का दान दिया; चेन्नई आई आई टी को भी ऐसे ही एक पूर्ववर्ती छात्र ने कई अरब डॉलर दिए; आई आई एम अहमदाबाद हो या फिर अति पिछड़ा राज्य बिहार की राजधानी पटना के सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल (सरकार द्वारा संचालित) के पूर्ववर्ती छात्रों द्वारा आर्थिक और अन्य दूसरे तरह की मिली मदद; एक उम्मीद जगाती है। लगता है कि अभी संवेदनशीलता बची हुई है।
पिरामिड में रिसाव
इस तरह की ख़बरें कई-कई मायने में अहम हो जाती हैं। भारतीय संदर्भ में ये किसी परंपरा के संवाहक सरीखे भी हैं। फिर चाहे तकनीकी विश्वविद्यालय हो, केन्द्रीय विश्वविद्यालय हो, स्वायतशासी विश्वविद्यालय हो या फिर स्व-वित्तपोषित विश्वविद्यालय या विद्यालय। हमारे देश में हर तरह के शिक्षण संस्थाओं से जुड़े छात्र अपनी क्षमता के अनुसार विद्यालय या विश्वविद्यालय के उत्थान के लिए जो कुछ बन पड़ता है, करते हैं। यहां ग़ौर करने लायक बात ये है कि निजी शिक्षण संस्थान इस तरह के क्रिया-कलापों से दूर, पूर्ववर्ती छात्रों के सम्मिलन जैसे कार्यक्रमों के आयोजनों पर ज़्यादा ज़ोर देता है। वो भी एक तरह के विज्ञापन के तौर पर। हेजेमनी थ्योरी के अनुसार जब अलग अलग स्तर या फिर छोटे शहरों तक इसका अनुकरण होता है, तो स्वरूप विद्रूप हो उठता है।
थोपा गया संघर्ष
निजी विद्यालयों के बच्चे भी अपने शुरूआती संस्था से जुड़ाव अनुभव करते हैं। इस बात को निजी संस्थान बेहतरीन तरीके से भुनाती हैं। इस क्रम में कम पूंजी वाले निजी संस्थान पीछे छूट जाते हैं। और, पीछे रह जाती है – एक टीस। वो टीस जितनी विद्यार्थियों के ज़ेहन में होती हैं, उससे कहीं ज़्यादा होती है, उन निजी संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के अंदर। क्योंकि, निजी संस्थान अपने विद्यार्थियों का जितना आर्थिक दोहन करते हैं, उसके अनुपात में वहां काम करने वाले शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को बेहद कम मानदेय प्राप्त होता है। नतीजतन उनका जीवन सेवानिवृति के बाद बहुत दयनीय हो जाता है। एक औसत जीवन के लिए उनका संघर्ष ताउम्र चलता रहता है।
लुटे हुए रईस
चूंकि निजी संस्थाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अभिभावकों के आर्थिक दोहन के साक्षी उनके बच्चे भी होते हैं। इसलिए भी, इन संस्थाओं से पढ़कर निकले बच्चे अपने स्कूली शिक्षकों को वो तवज्जो नहीं देते। वो ये मानकर चलते हैं कि जो मोटी फीस उन्होंने भरी है, वो सीधे—सीधे शिक्षकों की जेब में गए हैं। जबकि हक़ीक़त कुछ और होता है। अपने जीवन में सफल होने के बावजूद शिक्षकों सुध लेने वाले बच्चे इसलिए भी निजी संस्थानों से तो कतई नहीं निकलते। वो निकलते हैं, सरकारी संस्थानों से, स्व-वित्तपोषित संस्थानों से, स्वायत्त संस्थानों से, या फिर वहां से जहां से उनके करियर को मनचाहा मक़ाम मिलता है। निजी संस्थानों से निकले विद्य़ार्थी भूल जाते हैं – अपने जड़ को, अपनी नींव को। क्योंकि, उनके गहरे पैठ चुका होता है कि उन्होंने शिक्षा उचित मूल्य पर ख़रीदी थी/है। टियर वन, टियर टू और टियर थ्री शहरों के मझोले स्तर के निजी स्कूल आज भी शिक्षकों के आर्थिक, मानसिक दोहन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं कुछ अपवादों को छोड़ कर हालात कमोबेश एक से हैं, वो भी पूरे देश में।
शिक्षण संस्थाओं के संवाहक
यहां एक पहलू थोड़ा विचारणीय है कि क्या कुछ अच्छे निजी संस्थान इसलिए बहुत अच्छा कर रहे हैं क्योंकि उसे चलाने के लिए बहुत अच्छी पूंजी लगाई गई है? या विद्यालय की आधारभूत संरचना बहुत अच्छी है? या फिर संस्था ने देश के बेहतरीन शिक्षकों को चुनकर अपने यहां रख लिया है? यहां मानना होगा कि अच्छे विद्यालय बेहतर प्रदर्शन अपने विद्यार्थियों के बलबूते ही करते हैं। बहुत अच्छी पूंजी ज़रूरी हो सकती है, आधारभूत सुविधाएं भी आवश्यक हैं, अच्छे शिक्षकों की जितनी ज़रूरत एक संस्था को होती है, उस से कहीं ज़्यादा ज़रूरत होती है, अच्छे विद्यार्थियों की। क्योंकि अच्छे विद्यार्थी पहली शर्त होते हैं किसी स्कूल को सबसे अच्छा स्कूल साबित करने के लिए। यही वज़ह है हर साल होने वाले सर्वेक्षणों में स्कूलों की रैंकिंग बदलते रहती है। कोई भी विद्यालय या विश्वविद्यालय पहले या आख़िरी पायदान पर हमेशा नहीं बना रहता है। जिस सत्र में अच्छे विद्यार्थियों की संख्या जितनी अधिक होती है, उस सत्र में उस संस्था का प्रदर्शन उतना ही बेहतर होता है। कहने का तात्पर्य है कि स्कूल/कॉलेज/यूनिवर्सीटिज़ में पूंजी किसी की, कितनी भी लगी हो, आधारभूत ढ़ांचा चाहे जितना भी मज़बूत क्यों न हो, अच्छे विद्यार्थियों की कमी उसे औरों से कमतर साबित कर देती है।
नींव का निर्माण फिर से
अच्छे विद्यार्थी से अभिप्राय है वैसे छात्र जो किसी भीड़ का हिस्सा बनने की बजाए अपने लिए अलग रास्ता चुनने का माद्दा रखते हों। जो हर वक्त कुछ नया सीखने और करने को ललायित रहते हों। और अपने शिक्षक से हमेशा प्रोत्साहन की अपेक्षा रखते हों। वहीं औसत छात्र का लक्ष्य किसी भी तरह से डिग्री हासिल करने का होता है। जबकि शिक्षा का लक्ष्य ज्ञान प्राप्ति है। डिग्री, शिक्षण प्रक्रिया का एक उप-उत्पाद जैसा होता है। औसत से ऊपर के तमाम छात्र सीखने की ललक के साथ शिक्षण संस्थान में दाखिल होते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञानार्जन उनका लक्ष्य होता है। ऐसे छात्र जिज्ञासा से भरे होते हैं और इनकी जिज्ञासा शान्त करने की कोशिश में एक औसत शिक्षक भी विशेष हो जाता है। इस आधार पर ये बात भी कही जा सकती है कि अच्छे छात्र, अच्छे शिक्षक तैयार करते हैं और इस तरह से अच्छे संस्था का निर्माण सतत चलता रहता है।
कैसे बनती हैं इमारतें?
अमूमन उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद ही अच्छी नौकरी हासिल होती है या फिर बड़े व्यवसाय चलाए जाते हैं। लेकिन इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि उच्च शिक्षा हासिल करने के लायक तैयारी प्राइमरी, मिडिल और हाई स्कूल स्तर पर ही होती है। इन्हीं कक्षाओं में हर छात्र का असली हुनर पहचाना जाता है। और प्राय इन्हीं प्राइमरी-मिडिल-हाई स्कूल के शिक्षक के अनुशंसा पर ही अभिभावक करियर संबंधी बड़े फैसले लेते हैं। इन वर्गों में शिक्षक महज विषयों की पढ़ाई नहीं करवाते बल्कि तमाम तरह के क्रिया-कलापों के ज़रिए आने वाले ज़िन्दगी के लिए भी एक बाल मन को वयस्कता अपनाने के लिए तैयार करते हैं। गणित का शिक्षक सिर्फ गणित के समीकरण ही पढ़ा रहा होता है? वो तो ज़िन्दगी के अलग-अलग दौर के लिए सूत्र कैसे बनाते हैं, इसकी भी तैयारी करवा रहा होता है। विज्ञान का शिक्षक ज़िन्दगी के लिए भी विशेष ज्ञान देता है। ज़रूरत है बैठ कर सोचने की, सही तरीके से आकलन करने की, उनके सिखाए के विश्लेषण करने की।हीं कक्षाओं में हर छात्र का अइस
अवरूद्ध व्यक्तित्व का विकास, कैसे?
तकनीक के इस युग में निजी संस्थानों से निकले तमाम छात्र बहुत ही बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। क्योंकि, वो भी इस बाज़ारीकरण की ही देन हैं और जो सीखा है, उसी की पराकाष्ठा के दौर को जी रहे हैं। लेकिन जाने-अनजाने एक खालीपन उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हो चुका है। वो तलाशने की कोशिश करते हैं कि कमी किस बात की है लेकिन वो जान नहीं पा रहे हैं। संवेदना के जिस तार को जाने-अनजाने काट आए हैं, वो एक खालीपन के रूप में उनके साथ जी रहा है। ठीक वैसे ही जैसे दो-चार-दस हज़ार छात्र को तैयार कर चुका एक वृद्ध शिक्षक विचारशून्यता का शिकार हो रहा है। अगर ये तथाकथित सफल लोग थोड़े संवेदनशील हो जाएं तो उनके भीतर के कमी/खालीपन को भरते देर नहीं लगेगी।
हक़ या चुटकी भर नमक
यहां उस वृद्ध शिक्षक को भीख देने की गुज़ारिश कतई नहीं किया जा रहा है। यह तो उस स्वाभिमानी शिक्षक को भी गवारा नहीं होगा। यहां उसके जीवन को व्यवस्थित करने में योगदान देने की बात कही जा रही है। योगदान का अर्थ धन से कतई नहीं लगाया जाना चाहिए। योगदान का अर्थ है अपनी योग्यता के अनुरूप अपने प्रिय शिक्षक को इस तरह से स्थापित करने में मदद करना कि वो बढ़ती उम्र में भी अपने स्वावलंबन और स्वाभिमान के साथ दीर्घायु हो। एक उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करें कोई व्यक्ति टियर टू शहर में तीस साल तक किसी निजी शिक्षण संस्थान में बतौर शिक्षक काम करने के बाद सेवानिवृत हो जाता है। उसे सेवानिवृति के बाद नाम मात्र की राशि हाथ में थमा दी जाती है। संस्थान चूंकि प्राइवेट था इस वज़ह से भी पेंशन जैसी किसी चीज का प्रावधान नहीं किया जाता है। यदि पेंशन की व्यवस्था है भी तो बढ़ी हुई महंगाई दर (इनफ्लेशन) कसर पूरा कर देती है। सेवानिवृति के बाद यदि कोई शिक्षक, अपने पुत्र या पुत्री का आश्रित नहीं होना चाहता है तो बढ़ी महंगाई दर में उसकी जमा-पूंजी भी छह महीन या साल भर में स्वाहा हो जाती है। उस शिक्षक के लिए विकल्प क्या हो सकता है?
मदद करो अर्जुन!
यहां ऐसे ही शिक्षक/शिक्षिकाओं को विकल्प देकर उनके पुराने छात्र अपना योगदान दे सकते हैं। यहां एक बार फिर विकल्प धनराशि या कोई सम्पत्ति देना कतई नहीं है। बल्कि, शिक्षक को एक प्लेटफॉर्म मुहैय्या कराना है। अपने नेटवर्किंग के ज़रिए, अपने तकनीक ज्ञान के ज़रिए और सोशल नेटवर्किंग के ज़रिए। शिक्षक आयु बढ़ने के साथ हो सकता है कि बहुत मिहनत कर पाने में अक्षम हों लेकिन बैठ कर बच्चों को शिक्षा वो अभी भी दे सकते हैं। ऐसे शिक्षकों के लिए ऑनलाइन मौके मुहैय्या करवाना सबसे बेहतर योगदान होगा। आज ऑनलाइन ट्युटोरियल्स और क्लासेज़ की बाढ़ आई हुई है, जिनमें अपने रेफरेंस के ज़रिए शिक्षक/शिक्षिकाओं को स्थापित करवा कर छात्र अपना योगदान दे सकते हैं। या फिर कुछ नए तरीके सीखा कर उन्हें स्थापित होने में मदद कर सकते हैं।
बज़ारीकरण एक सच्चाई है, इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। वैश्वीकरण के दौर में इसकी स्वीकार्यता ही समृद्धि का द्वार खोलती है। लेकिन इन सबके बीच यदि हम अपनी परंपरा का भी संपोषण कर सके तो एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण सहज होगा। व्यवसायीकरण के दौर में हम अपनी संवेदना को बचाए रख पाने में सफल रहे तो आनेवाली समृद्धि का समुचित आनन्द उठा पाने में भी सफल होंगे।